इंसानियत का सवाल

ग़ज़ल

इंसानियत का सवाल पैदा किया जाए!
सड़क पर आकर बवाल पैदा किया जाए!

क्या सही है इस तरह हंगामा खड़ा करना,
इसके प्रति दिल में ख्याल पैदा किया जाए!

बस एक हाथ के पीछे लाखों हाथ उठे हों,
कुछ इस तरह का हाल पैदा किया जाए!

तीर नहीं तो बस तुक्का ही सही यारो,
दिलोजान से ऐसा भूचाल पैदा किया जाए!

रंग में भंग तो हर काज में पड़ता है यहाँ,
बस साध बनाकर मशाल पैदा किया जाए!

नहीं, एक बार मुद्दा उठाना मेरी कहन नहीं,
जब तक न बने हर साल पैदा किया जाए!

हृदय के तार झंकृत होकर बज उठे “मुसाफ़िर “,
इसमें शामिल नया ताल पैदा किया जाए!!

रोहताश वर्मा “मुसाफ़िर “

         

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