इक बूंद पानी

मुक़द्दर आज़मा कर क्या करें हम
बना कर रेत पर घर क्या करें हम

लबों को चाहिये इक बूँद पानी
समुन्दर का समुन्दर क्या करें हम

नया ये दौर मोबाइल का आया
उसे अब ख़त ही लिख कर क्या करें हम

सताए याद हर मौसम में तेरी
मई हो या दिसंबर क्या करें हम

मिला देता है मिट्टी में तू खवाहिश
बता तेरा मुक़द्दर क्या करें हम

जहां वीरानियां होती हैं इस में
बसे गें ही कबूतर क्या करें हम

ना ख़ुद मज़लूम जब बेदार होवे
शिकायत ही सितम-गर क्या करें हम

सुकूँ मिलता नहीं है अब कहीं भी
यहां पर या वहां पर किया करें हम

नहीं अब साद कोई ख़्वाब उगते
हुई है आँख बंजर क्या करें हम

अरशद साद रुदौलवी

         

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