“इक मुस्कुराता हुआ चेहरा”…

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इक मुस्कुराता हुआ चेहरा आज कितना ग़मग़ीन है ।
उधर कोई और हादसा को करने में तल्लीन है ।
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तरसने लगी है आज सुंदरता माहौल को देखकर ,
अधिकतर आँखों में भूखी चमक व विचार बहुत मलिन है ।
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क्यों समझ नहीं आता है , भूखे हवस के पुजारियों को ,
किसी तन व मन को नोचना अपराध कितना संगीन है ।
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बच्चों को भी बख़्शते नहीं ये इंसानियत के दुश्मन ,
वृद्धा से बलात्कार की हादसा भी ताज़ातरीन है ।
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ख़ुदा से कुछ ख़ौफ़ करो ऐ अस्मत के निर्दयी लुटेरों ,
तुम्हारी माँ-बहन और बाकी में फर्क बस महीन है ।
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ख़ामोशी बेटी की दंश है आज के समाज के लिये ,
मुस्कुराहट इक बेटी के लिये कितना बेहतरीन है ।
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हो दंड ऐसा कि इज्जत से अब न कोई खेले “कृष्णा”,
माँ-बहन की अनमोल आबरू अब विधि के ही अधीन है ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 14/04/2018 )

         

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