“इतना गहरा समंदर नहीं है”…

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ख़ुशनुमा आजकल दिखता कोई मंज़र नहीं है ।
भरा-भरा-सा आजकल यहाँ कोई घर नहीं है ।
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प्यार का पौधा एक बार लगाकर तो देख लो ,
एक भी धड़कता हुआ दिल यहाँ बंजर नहीं है ।
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एक गुज़ारिश है , बस दुश्मनी को जरा छोड़ दो ,
यकीं हो जायेगा सच में , बोझिल सफ़र नहीं है ।
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घर से बाहर निकलते ही सब सचेत हो जाओ ,
पाक मिल जाये यहाँ , एक भी नज़र नहीं है ।
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ज़ख़्म देने के नये तरीके ईज़ाद मत करो ,
जान लो , तुमसा हर किसी का दिल पत्थर नहीं है ।
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संबंधों को फ़िक्र का खाद-पानी-हवा चाहिये ,
बेफ़िक्र हुए अगर , रिश्तों का शाखे-तर * नहीं है ।
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शराब को यूं ही बदनाम कर रखा है ज़माने ने ,
वरना मोबाईल का नशा भी कमतर नहीं है ।
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बेवज़ह उलझना ठीक नहीं मंजिल को छोड़कर ,
उलझनों के साथ सही सफलता अक्सर नहीं है ।
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डूबना है अगर “कृष्णा” , ज़िंदगी में डूब जाओ ,
जान जाओगे इतना गहरा समंदर नहीं है ।
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* शाखे-तर = हरा टहनी
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