“इम्तिहान है बहुत”…

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ज़रा ग़ौर करो हम पर कइयों के एहसान है बहुत ।
एक अच्छी ज़िंदगी के लिये आगे इम्तिहान है बहुत ।
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खुले विचारों का होना अच्छी बात मगर याद रहे ,
बच्चों को ज्यादा छूट दे पालक परेशान है बहुत ।
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हर बंदा अच्छा है , इसमें ज़रा शक़ की ग़ुंजाइश है ?
सदा ग़म वही देता जो होता मेहरबान है बहुत ।
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ज़रा देखकर खिला करो नाज़ुक रंग-बिरंगे फूलों ,
मसलने वाले मिलेंगे क्योंकि इधर सुनसान है बहुत ।
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समय का परिवर्तन तय है , सब शख़्स क्यों भूल जाते हैं ?
वृद्धाश्रम की गली दिखाने वाले शैतान है बहुत ।
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दो दिन की बेरूखी में भी ज़ख़्म हरे हो जाते हैं ,
देखकर चलना , यहाँ अलग किस्म के इंसान है बहुत ।
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सारे अहसास दरो-दीवार से निकलने लगे हैं कहीं ,
खाली डिब्बा बन रह गया है ये जो मकान है बहुत ।
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हँसमुख शक़ल को देखकर गलत फ़हमी में नहीं रहना ,
उस शख़्स के दिल में देखना चोट का निशान है बहुत ।
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बार-बार भूलने की बीमारी भी ज़रा ठीक नहीं ?
यदि साँस लेना कभी भूल गये तो नुकसान है बहुत ।
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चाह के दौड़ में वक़्त यूं ही गुज़ार देता आदमी ,
और जब मौत पास आये , हर शख़्स हैरान है बहुत ।
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ग़ज़लों का रूख अब दूसरी तरफ कर लेनी चाहिये ,
सारे शहर में हमारी ऐ “कृष्णा” पहचान है बहुत ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 29/04/2018 )

         

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