“उलझते क्यों फिज़ूल जातिवाद पर”…?

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सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा एक बात पर ।
कुछ कहना चाहता हूँ आज , स्वार्थी-कायर समाज पर ।
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शर्मिंदगी मुझको भी है तो बाबा साहेब को भी है ,
भाई-चारा छोड़ उलझते क्यों फिज़ूल जातिवाद पर ?
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अपना वज़ूद क्या है लोग कभी भी ग़ौर करते नहीं ,
पूर्ण आज़ादी का स्वरूप कहाँ , आज यहाँ साज पर ?
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इंसान को जीने हेतु रोटी नहीं , विचार चाहिये ,
बाबा साहेब के ये विचार रखो अपने दिमाग पर ।
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याद करो बाबा की दी वो सारी अमोल सौगातें ,
खुश तो न होते होंगे आज , वो भी भीतरी घात पर ।
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जाति-जाति में भेद कर , छुआ-छूत को फिर मत जगाओ ,
वसुधैव-कुटुम्बकम ज़रूरी है आज के हालात पर ।
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ज्ञान का सर्वांगीण विकास ही अंतिम लक्ष्य है “कृष्णा”,
फ़क्र है ये सिखाने वाले बाबा साहेब महान पर ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 14/04/2018 )

         

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