एक रोटी के लिये ज़िल्लत उठानी है बहुत

ज़िन्दगी का क्या भरोसा ये तो’ फानी है बहुत l
बैठिये पहलू में आकर शब सुहानी है बहुत ll

हो न हो महबूब मेरे आ गये महफिल में हैं,
हो गई खुशबू अचानक जाफ़रानी है बहुत l

मुफलिसी मुफलिस से हँसकर बात ये कहने लगी,
एक रोटी के लियेज़िल्लत उठानी है बहुत l

फ़िक्र करना छोड़िये अब आप अपनी प्यास की,
आज भी आँखों में मेरी यार पानी है बहुत l

अश्क भी आँखों में अब हँसते हुए आते सभी,
जानते हैं टीस इस दिल की पुरानी है बहुत l

वो यकीनन मंजिलों पर जाके’ ही ठहरेगा अब,
आजकल रफ़्तार में उसकी रवानी है बहुत l

शौक को तरजीह दे जो फ़र्ज़ कल पर टालते,
सोचना उनका ये शायद ज़िन्दगानी है बहुत l

ज़ख्म जो देकर गये वो ज़ख्म अब तक है हरा,
काटने को उम्र पूरी ये निशानी है बहुत l

हौसला कायम है’ तो फिर सोचता यह किसलिये,
सामने तूफ़ान और कश्ती पुरानी है बहुत l

@ ‘विचित्र’

         

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