एक सदी से सीने में कोई तो दर्द दबा होगा

भरी महफ़िल में सन्नाटा पसर गया होगा
ज्यों ही उसने गलत को गलत कहा होगा

ज़ख्म बस यूँ ही तो नासूड़ नहीं बना होगा
एक सदी से सीने में कोई तो दर्द दबा होगा

क़त्ल हुआ शख़्स खुदा का ही बंदा होगा
मरते-मरते जरूर “हे राम ” बोला होगा

ये कुफ्र की बंदगी से किसका भला होगा
इस चिंगारी से कल हवा भी शोला होगा

फिर कहीं कोई-न-कोई बचपन जला होगा
किलकारी को दौलत से जब तौला गया होगा

सलिल सरोज

         

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