ऐ ज़ीस्त देनेवाले किस बात की सजा है

ऐ ज़ीस्त देनेवाले किस बात की सजा है
ये क़ैदे बामशक्कत जो तूने की अता है

बिकते हैं बोलियों में खादी पहनने वाले
ये राज़ अंदरूनी सबको यहाँ पता है

कल तक जो रास्तों पर पॉकेट मारता था
वो बन गया मिनिस्टर अख़बार में छपा है

सहरा को छान देखा बस्ती – नगर में ढूँढा
अपने ही दिल के अंदर हर एक सुख मिला है

मौसम था ख़ुश्क जब तो छत से थे देखे तारे
सावन में सारे घर में पानी टपक रहा है

महफ़िल में तेरी “रजनी” है छा गयी वीरानी
है हर तरफ ख़मोशी ये कैसा माजरा है

         

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