“और क्या…”

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ज़िंदगी का मतलब गिरना फिर सँभलना और क्या ?
इस ज़हां के आग में पककर चमकना और क्या ?
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क्यों पैदा हुए यहाँ , ये भी जानना है ज़रूरी ,
नसीब में लिखा परवाने का जलना और क्या ?
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अंधेरे के बाद तो उजाला आता ही है ,
धीरज के साथ राह में डटे रहना और क्या ?
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नशे की लत यानी दो पग और मौत की ओर ,
बेहद बुरा है तलब में यूँ भटकना और क्या ?
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वक़्त रहते हर काम को अंजाम देना ठीक ,
वर्ना पछताकर बाद में सुबकना और क्या ?
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बीच राह में रूके तो मंज़िल नहीं मिलेगी ,
धीरे ही सही मगर निरंतर चलना और क्या ?
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चारदीवारी में रह “कृष्णा” क्या दिखाओगे ?
कुछ बनना है तो घर से निकलना और क्या ?
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— °•K.S. PATEL•°
( 23/02/2019 )

         

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