कभी मोमिन तो कभी मीर को भी बुलाया करो

जो ग़ज़ल लिखो कभी तो उसे सुनाया भी करो
कभी मोमिन तो कभी मीर को भी बुलाया करो

महलों के बंद कमरों में चुभन है ,बहुत घुटन है
जो नींद चाहिए तो खुली फ़िज़ा में सो जाया करो

ये इश्क़ की लपट है ,बहुत देर तलक जलाएगी
बचना है गर इससे तो आँखों से इसे बुझाया करो

बचपन की तासीर पर उम्र की दाग ना लग जाए
तो रात को दादी-नानी की कहानियाँ सुनाया करो

अपनी ही खुदी पर से ऐतबार ना उठ जाए कहीं
वक़्त रहते हुए अपनी ज़मीर को भी जगाया करो

सलिल सरोज

         

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