कहीं न इनसे मचान ऊँचे

मुढ़ेरें उनकी यूं चीखती हैं चढ़े हैं जिनके गुमान ऊँचे|
न जाने कितने घरों को लूटा बनें हैं तब ये मकान ऊँचे|
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जहाँ पे पहुँचे ये हाथ अपने वही सितारे अता हमी को,
नहीं उछलकर भी छू सकें हम लगा न इतने निशान ऊँचे|
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उतारें कैसे इन्हें जहन में समझ ऩ कुछ भी ये आ रहा है,
चरित्र जिनके गिरे हुए हैं वो दे रहे हैं बयान ऊँचे|
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यहाँ बदलता अवाम देखा पलों में छीने ये ताज अक्सर,
सदा किसी के नहीं रहे हैं कभी भी जालिम रुझान ऊँचे|
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खरीद पाओगे क्या ‘मनुज’तुम यूँ आज पैसों से आसमां को,
दिलों में उतरो जहान देखो कहीं न इनसे मचान ऊँचे|

         

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