“कहीं न नासूर हो जाये”…

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कुछ इस तरह से ज़िंदगी में न बेवज़ह सरूर हो जाये ।
सोच पे लगाम हो , गलती से न कोई दूर हो जाये ।
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वाकई सादा ज़हां भी रंगीन ज़न्नत बन सकता है ,
बशर्ते इंसानों के बीच से दूर मग़रूर हो जाये ।
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जिसकी सूरत से ज्यादा सीरत ज्यादा ख़ूबसूरत हो ,
वो शख़्स से शख़्सियत होकर ज्यादा मशहूर हो जाये ।
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चले हैं वो ज़ख़्मे-यार का मरहम बनने , मगर डर है ,
ज़ख़्म ये गहरा है , बाद में कहीं न नासूर हो जाये ?
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कोई हार जाता बार-बार तो उसे ग़म किस बात का ?
देखो तो उसके खाते तज़ुर्बा खूब ज़रूर हो जाये ।
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कोई बिछड़ा यार मुद्दतों बाद मिल जाये तो क्या हो ?
हर वाक्या बस यार के अलावा नामंज़ूर हो जाये ।
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छल से परे कहाँ है आजकल की कोई दोस्ती “कृष्णा” ?
लाभ दिखा कि हर कोई सोचने पे मज़बूर हो जाये ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 26/04/2018 )

         

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