“काम्याब हैं हम”…

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ख़ुद को पहचानो यारों , नायाब भी हैं हम ।
इंसान जन्म लेते ही कामयाब भी हैं हम ।
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होकर मायूस नहीं कोई पल को बिताओ ,
अच्छे विचार बोओ तो शादाब * भी हैं हम ।
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क्या करने आये हैं ज़हान में , सोचो ज़रा ,
गुण औ दोषों का , जान लो हिसाब भी हैं हम ।
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ईर्ष्या-द्वेष , छल-कपट से बस दूर हो जायें ,
प्यार बाँटने का मुख़्तसर * ज़वाब भी हैं हम ।
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दिल किसी का तोड़ने से पहले सोच लेना ,
किसी के ज़ेहन में बस चुके ख़्वाब भी हैं हम ।
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क्या देना चाहते हैं लोगों को ग़ौर करो ,
काँटा भी हैं औ शग़ुफ़्ता * गुलाब भी हैं हम ।
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अधिक अकड़ दिखाना भी वाज़िब नहीं यहाँ पर ,
हस्ती * की बात कर लें तो हबाब * भी हैं हम ।
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ज़िद करो , जोर लगाओ तो क़रीब मंज़िल है ,
अंधेरा दूर होगा , आफ़ताब भी हैं हम ।
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करम कुछ ऐसा कर जाओ “कृष्णा” के यारों ,
कि एक भी बंदा कहे मत , ख़राब भी हैं हम ।
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* शादाब = ताजा , हरा-भरा
* मुख़्तसर = संक्षिप्त
* शग़ुफ़्ता = खिला हुआ
* हस्ती = अस्तित्व
* हबाब = बुलबुला
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— °•K.S. PATEL•°
( 07/04/2018 )

         

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