“कोई तो रोकता ही नहीं”…

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कहीं ज़ुबान ख़ामोश , कहीं दिल बोलता ही नहीं ?
कोई क्या बोले , बात कोई तोलता ही नहीं ?
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तोल ले जो नीयत फिर रंज़ किसी बात का न हो ,
ग़म के बहाने फिर वो बोतल खोलता ही नहीं ?
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खुली मय की बोतल तरह है ये ईमानदारी ,
कोई छूता नहीं , तो कोई छोड़ता ही नहीं ?
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छोड़ें कैसे सारे ऐब को अपने शरीर से ?
तलब रग़ में न मिले तो ख़ूं कुछ घोलता ही नहीं ?
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घोल क्या देते ज़ज़्बातों में , गलत ख़बर सुनकर ,
जाने क्यूं नज़रें सही ख़बर टटोलता ही नहीं ?
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टटोल लेना बहुत ज़रूरी है मन की थाह को ,
चाह बेवज़ह किसी ओर रूख मोड़ता ही नहीं ?
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मुड़े कहीं उससे पहले “कृष्णा” की बातें सुनो ,
बाद में मत कहना , कोई तो रोकता ही नहीं ?
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— °•K.S. PATEL•°
( 03/05/2018 )

         

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