“क्या हो गया है…?”

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आजकल हर किसी को इस ज़हान में ये क्या हो गया है ?
बेवज़ह अपनी किस्मत से कुछ-कुछ फासला हो गया है ।
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पर अपनी गलती को मानने को तैयार नहीं इंसां ,
औ मुकद्दर में कुछ नहीं सोचकर ख़ुद ख़फ़ा हो गया है ।
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मेहनत से दूर भागने का इधर हर नज़ारा देखो ,
बैठे-बैठे सभी को नसीब का आसरा हो गया है ।
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क्या होगा आखिर प्रयास से एक बार गिरेंगे हम जो ,
गिरकर उठा जो , शिखर पर उसका ही कब्जा हो गया है ।
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वक़्त जो चला गया , कल फिर से इधर आ नहीं पायेगा ,
वक़्त रहते जो सम्हला , उसका यहाँ मजा हो गया है ।
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हाथों की इन लकीरों में क्या रखा है कहो तो यारों ,
जो कर्म किया उसके हाथ में लकीर नया हो गया है ।
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संघर्ष से जो भागता नहीं है , जरा देख लो “कृष्णा”,
उसके मंज़िल की तरफ़ मुकद्दर का रास्ता हो गया है ।

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— °•K.S. PATEL•°
( 02/11/2018 )

         

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