“क्यों नहीं ये वन छोड़ देते हैं”…

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आजकल लोग क्यों नहीं पुरानी चलन छोड़ देते हैं ।
ताज़ी हवा के लिए क्यों नहीं ये वन छोड़ देते हैं ।
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अब हर वो शख़्स इंसान कहलाने का हकदार नहीं ,
जो ग़ैर-वाज़िब स्वार्थ के वास्ते अमन छोड़ देते हैं ।
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किसी को भी इतना ज्यादा मत सताओ तो ही अच्छा ,
सीधे-सरल लोग भी आखिर में सहन छोड़ देते हैं ।
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कर्जा का भी एक अज़ीब किस्सा दिखता है यहाँ पर ,
जो अमीर पर चढ़ जाये तो ये वतन छोड़ देते हैं ।
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और यही कर्जा जब गरीब पर चढ़ जाये तो साहब ,
बिना सोचे-समझे नादां अपना तन छोड़ देते हैं ।
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ये तन के हवस के सभी पुजारियों को कड़ा दंड दो ,
ये आत्मा को लहुलुहान करके बदन छोड़ देते हैं ।
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शहीद फौजियों के परिवार की सुध कभी लेते नहीं ,
नेता बस तस्वीर के सामने सुमन छोड़ देते हैं ।
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आसां लगता है एक झटके में आत्महत्या करना ,
मगर परिवार के लिए कितना उलझन छोड़ देते हैं ।
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शत-शत प्रणाम “कृष्णा” उन सभी रहम-दिल इंसानों को ,
जो जाते हुए दूजे के लिए नयन छोड़ देते हैं ।
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