खतरे में मज़हब

ग़ज़ल

खतरे में मजहब है।

साये में धूप,बात अजब है।
देखो शहर में तमाशा गजब है।

हर कोई बाँटे धर्म,जाति को,
लगता अब खतरे में मजहब है।

अपना अपना उल्लू सीधा करना,
बस ऐसे राजनीतिक करतब है।

मानवता की ज्वाला है बुझी सी,
गुनहगार भी इसमें हम सब है।

बूढ़े साये की कदर कहाँ पर,
हर कोई हुआ यहाँ बेअदब है।

उसके लिए सब समान “मुसाफिर”,
यहाँ हर क़ौम में बँटा वो रब है।।

रोहताश वर्मा “मुसाफिर”

         

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