“ख़ाक़ पर जो बिखेरा है”…

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फिर से तुम सब देख लो एक नया सबेरा है ।
मैं अपनी क्या कहूँ चारों तरफ़ ……अंधेरा है ।
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आज से पहले कुछ भी पूछ-परख न थी मेरी ,
और आज….सबने झुंड बनाके मुझे घेरा है ।
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कंधे बदल-बदल के बस जाना अच्छा लग रहा ,
सक़ून मिल गया…ज़िस्म पे हाथ जबसे फेरा है ।
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जल्दी न चलो आगे चलने वालों ओ हमसफ़र ,
भूला ना कुछ…..यादों का वन बहुत घनेरा है ।
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शमशान घाट आकर ये बात समझ में आई ,
न ही मैं किसी का और…..न ही कोई मेरा है ।
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आँसुओं ने मानो आज कद्र करना सीख लिया ,
वक़्त ने किसी हस्ती को ख़ाक़ पर जो बिखेरा है ।
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अब सो जाओ पुर-सक़ून तमन्ना को साथ लिए ,
इस रूहे-ज़िंदगी के लिए…… बस यही डेरा है ।
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सफेद क़फ़न से सफेद राख तक का लम्बा सफ़र ,
मगर अब यही मेरी मंजिल………यही बसेरा है ।
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ज़िंदगी से मौत के मध्य का सफ़र क्या कहें “कृष्णा”,
शायद वक़्त बलवान…… जो हर पल का लुटेरा है ।
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