गजल आसमान

मुफलिसी जहां की बस मैं जबान रखता हूं |
आज हाथ में अपने आसमान रखता हूं |

गौर कर जरा बस्ती पे कभी खुदा मेरे |
हैं गरीब सब तो घर में दुकान रखता हूं |

है खबर जमीं तो तुमने खरीद ली सारी |
आसमान पे , लो अपना मकान रखता हूं |

तुम्हे गर लगाना है आग तो लगा दो , पर |
आँख में जहाँ वालों मै तुफ़ान रखता हूं |

जानते रहे बेईमान है खुदा हम भी |
इसलिए बेईमां के घर पे जान रखता हूं |

काश इश्क का वो आगाज तो करें गर ‘मै |
इक तरफ मुहब्बत ए कद्रदान रखता हूं |

जब यहाँ वहाँ का अरविन्द ने जमीं छोड़ा |
हाथ में तेरे लो ‘ सारा जहान रखता हूं |
❥ कुमार अरविन्द ( गोंडा )

         

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