गजल का मेआर

गिरता मेयार तिरा कैसे बचाऊं मैं ग़ज़ल
इस तलातुम से तुझे कैसे उभारूं मैं ग़ज़ल

अब कोई ज़ुल्फ़ सँवारूं कि सँवारूं मैं ग़ज़ल
ज़िंदगी तुझको निखारूं या निखारूं मैं ग़ज़ल

ज़िंदगी तेरे तजुर्बे की स्याही लेकर
दिल से निकली है जो काग़ज़ पे उतारुं मैं ग़ज़ल

इस नए दौर में कुछ लोग तुझे लौट रहे
आबरू तेरी बता कैसे बचाऊं मैं ग़ज़ल

दिल तो कहता है कि अशआर की बारिश कर दूं
चांदनी चांद सितारों से सजाऊँ मैं ग़ज़ल

जिनसे रोशन हो तिरा नाम ज़बान-ए-उर्दू
उन चराग़ों को तिरे ढूंढ के लाऊँ मैं ग़ज़ल

मुझसे इक बार अकेले में कहीं मिल तो सही
फिर तुझे साद के हर ज़ख़म दिखाऊँ मैं ग़ज़ल

अरशद साद रूदौलवी

 

 

         

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