गरीब अब तलक मज़लूम ,बेतहाशा है

गरीब अब तलक मज़लूम ,बेतहाशा है
इस मुल्क में होता रोज़ यही तमाशा है

चिराग सो गया अँधेरे में दुबकके कहीं
हर ओर फैला हुआ घनघोर निराशा है

सब-के-सब सफेदपोश हो गए बेपर्दा
हर अखबार में हो रहा यही खुलासा है

कल फिर पूर्णिमा की चाँद आ जाएगी
इस रात को इतना भी नहीं दिलासा है

जिसको चुना था अपनी हिफाज़त को
वही भेड़िया बन जाए , क्या भरोसा है

सलिल सरोज

         

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