गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में

गर अपना ही चेहरा देखा होता आईने में
तो आज हुई न होती मुरब्बत ज़माने में

गर मशाल थाम ली होती दौरे-वहशत में
तो कुछ तो वजन होता तुम्हारे बहाने में ।

जिसकी ग़ज़ल है वही आके फरमाए भी
वरना गलतियाँ हो जाती है ग़ज़ल सुनाने में ।

बाज़ार में आज वो नायाब चीज़ हो गए
सुना है मज़ा बहुत आता है उन्हें सताने में ।

रूठना भी तो ऐसा क्या रूठना किसी से
कि सारी साँस गुज़र जाए उन्हें मनाने में ।

एक उम्र लगी उनके दिल में घर बनाने में
अब एक उम्र और लगेगी उन्हें भुलाने में ।

दौलत ही सब खरीद सकता तो ठीक था
यहाँ ज़िंदगी चली जाती है इज़्ज़त कमाने में ।

वो आँखें मिलाता ही रहा पूरी महफ़िल में
देर तो हो गई मुझ से ही इश्क़ जताने में ।

जिधर देखो उधर ही बियाबां नज़र आता है
नदियाँ कहाँ अब मिल पाती हैं मुहाने में ।

गर बाप हो तो जरूर समझ जाओगे कि
कितना दर्द होता है बच्चियाँ रुलाने में ।

जो गया यहाँ से वो कभी लौटा ही नहीं
अब कौन मदद करे उजड़े गाँव को बसाने में ।

माँ तो पाल देती है अपनी सब ही संताने
पर बच्चे बिफ़र जाते हैं माँ को समझ पाने में ।
सलिल सरोज

         

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