गर बेटियों के वास्ते राहें है ख़ौफ़नाक

++एक बेरदीफ़ मुसल्सल ग़ज़ल ++
(221 2121 1221 212 )
गर बेटियों के वास्ते राहें है ख़ौफ़नाक
करिये यक़ीन आप कि मंज़र नहीं है पाक
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घर में भी अब रही नहीं महफ़ूज़ बेटियाँ
जख्मों से हो रहें है जिगर रोज़ चाक चाक*(*टुकड़े टुकड़े )
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हमले जो अस्मतों पे लगातार हो रहे
चेहरा-ए-मुल्क और ज़बीं पे दाग़ शर्मनाक
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सदमा मुझे लगा हुई हैरत है जान के
कानून का लुटेरे बना दे रहे मज़ाक
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मीजान-ए-मजहबी* पे इसे तोलना बुरा (*धर्म के तराजू पर )
ये पुरख़तर भी क़ौम की ख़ातिर है शर्मनाक
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सीखा नहीं सबक़ मरी बेकार निर्भया
हालात ज्यों के त्यों हैं वही पात वो ही ढाक
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रहम-ओ-करम न ऐसे दरिंदों पे हो कभी
ज़िंदा जलाएं या करें सीधा सुपुर्द-ए-ख़ाक
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नापाक हरकतों पे तो है रोक लाज़िमी
लेकिन पहल करेगा कोई सब रहे हैं ताक
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डालो ‘तुरंत’ नाकों में इनके नकेल अब
मुमकिन न होगी वरना बचानी हमारी नाक
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
05 /07 /2018

         

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