ग़ज़ल -सच की दीवार पर, ताला लगा दो यारो! !

ग़ज़ल

सच की दीवार पर, ताला लगा दो यारो!
ये जलते हुए सारे, चिराग बुझा दो यारो !

हम आशिक नहीं गुलशन के कहीं ओर चलो,
इस पथ पर आज, कांटे बिछा दो यारो!

बहुत रहम कमाया, सच में पनाह करके,
अब झूठ पर, पर्दे गिरा दो यारो!

हर वक्त होता आया है, इंसानियत का खून,
मेरा जमीर जगा है, खून करवा दो यारो!

कटघरे में खड़ा है, बेगुनाह, लाचार इंसान,
खरीद लो इंसाफ, मौते -सजा दो यारो !

हां यही इस मजहब की खासियत बन गई,
हंगामा करने के लिए, कर्फ्यू लगा दो यारो!

हक की लड़ाई में शामिल कुछ सौदागर है,
जान की कीमत नहीं, गिरवी रखा दो यारो!

जब ऐसा लगे “मुसाफ़िर “,बाजी हार में है,
बोलकर झूठ यहां, भगदड़ मचा दो यारो! !

रोहताश वर्मा “मुसाफ़िर “

         

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