“ग़र दिल मिल जाये तो”…

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ग़र दिल मिल जाये तो रिश्तों में दूरियाँ नहीं होती ।
ग़र कैद में हों तो ख़ूबसूरत तितलियाँ नहीं होती ।
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पैसा कमाने का ज़िद सदा अपनों से दूर ले गया ,
परिवार को देते अहमियत , तन्हाइयाँ नहीं होती ।
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हाँलाकि उसके पैर में अब बहुत पड़ गये हैं छाले ,
मगर इन उसूलों के आगे दुश्वारियाँ नहीं होती ।
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सो जाता है वो मालकिन की अनेक गालियाँ खाकर ,
सबके नसीब में अपनी माँ की लोरियाँ नहीं होती ।
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शराब की बोतल के लिये कर दिया बेटी का सौदा ,
इस क़दर वाज़िब ख़्वाहिश और मज़बूरियाँ नहीं होती ।
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ये तो हर ख़ुरापात इंसान के दिमाग की है उपज ,
वरना इतनी बेदर्द बेज़ुबान गोलियाँ नहीं होती ।
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ज़माने की विसंगतियाँ ही यक़ीनन क़सूरवार हैं ,
वरना पैदाइशी बदनाम कभी गलियाँ नहीं होती ।
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शानो-शौक़त इफ़रात मगर शांति कोठियों से गायब ,
जो सक़ून मिले तो छोटी कभी खोलियाँ नहीं होती ।
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गलतफ़हमी पालने से पहले ज़रा ये भी सोच लो ,
जड़ को मज़बूत किये बगैर हरी पत्तियाँ नहीं होती ।
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दूसरों के लिये भी कभी जीना सीख तो लो साहब ,
जान लो इससे बड़ी ज़माने की खुशियाँ नहीं होती ।
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कभी याद तो करो , “कृष्णा” को भी पता चल जायेगा ,
चुपचाप रहने वाली कभी भी हिचकियाँ नहीं होती ।
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