गुलज़ार है आतिश

लगी है जिससे कारी ज़र्ब वो पत्थर सलामत है
जो तुमने पीठ पर मारा था वो ख़ंजर सलामत है

तास्सुब और हसद के बेशतर शोले उठे लेकिन
ख़ुदा का शुक्र है बस्ती में मेरा घर सलामत है

परेशां हो नहीं सकता कभी वो शख़्स दुनिया में
ख़ुदा-ए-पाक का जिसके भी दिल में डर सलामत है

अमीर-ए-शहर की दहलीज़ दुनिया को मुबारक हो
अगर सजदा ही करना है ख़ुदा का दर सलामत है

सदाक़त छोड़ दूं कैसे में आख़िर मौत के डर से
अभी दस्तार बाक़ी है अभी तो सर सलामत है

घुटन महसूस होती है इमारत की बुलंदी से
सुकून-ए-दिल की ख़ातिर गांव का छप्पर सलामत है

मिला है नील में रस्ता कहीं गुलज़ार है आतिश
कहीं पर-आब ज़मज़म से कोई ठोकर सलामत है

ख़ुदा का हो गया है जो ख़ुदा उस का हुआ बे-शक
शहीद-ए-कर्बला से आज भी मिंबर सलामत है

मिली है साद रहज़न को यहां पर राहबरी जब से
ना इस्मत ही सलामत है ना माल-ओ-ज़र सलामत है

अरशद साद रूदौलवी

         

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