“चला करो घास पर”…

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बाहर से लगाम दे दो झूठी मिठास पर ।
गुलामी ठीक नहीं , कुछ रहम करो दास पर ।
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सच में पुण्य का लाभ ज़रूर मिल जायेगा ,
कुछ मुस्कुराहट उड़ेल दो किसी उदास पर ।
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आलसपन को त्यागना ज़रूरी है साहब ,
उम्र लंबी होगी , सुबह चला करो घास पर ।
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फैशन के नाम पर सब कुछ अच्छा है कहाँ ?
तन को फबे , नज़र डालो ऐसे लिबास पर ।
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खुली आँखों से ख़्वाब देखना है ज़रूरी ,
किस्मत मेहरबां होती अक्सर बिंदास पर ।
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वह जा चुका था अपनी गलती को मान के ,
अब क्या फायदा , मय सोचे भरी गिलास पर ?
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सुनो , दिल का सौदा कभी रास नहीं आता ,
जान छिड़कना मत कभी किसी बदहवास पर ।
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दोस्ती ज़िंदगी भर बरकरार रह सकती है ,
बशर्ते ऊँगली नहीं उठे इक विश्वास पर ।
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कुछ बोलने से पहले सोच तो लो “कृष्णा”,
छवि ख़राब हो जाती है सभी बकवास पर ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 07/05/2018 )

         

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