“चल सको तो चलो”…

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो ।
दुनिया की ये भीड़ से जो निकल सको तो चलो ।
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राह में बेहिसाब मिलेंगे कंकड़ औ पत्थर ,
रूकावटों के बीच जो सम्हल सको तो चलो ।
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ख़ुद की अकड़ से यहाँ भला नहीं होने वाला ,
अच्छे-अच्छे साँचे हैं , जो ढल सको तो चलो ।
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पुरानी रीति-नीति आजकल है नहीं कारगर ,
दुनिया के साथ ख़ुद को जो बदल सको तो चलो ।
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सौ बुझे दिये से एक जलता दिया काफी है ,
रोशनी देने के लिए जो जल सको तो चलो ।
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कोई नहीं है अब तबियत ठीक करने वाला ,
अपने-आप ही एक बार बहल सको तो चलो ।
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आसां नहीं “कृष्णा” बुराइयों के साथ रहना ,
हर बुराई को कदम तले मसल सको तो चलो ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 04/10/2018 )

         

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