चाँद मेरी छत पे

जो मुहब्बत की तिजारत पे उतर आता है
फिर तो वो शख़्स ज़लालत पे उतर आता है

रोज़ रातों में वो तन्हाई का साथी बन कर
चांद चुप के से मिरी छत पे उतर आता है

तुम दलीलों पे दलीलें दो किसी जाहिल को
जब वो हारे तो जिहालत पे उतर आता है

इस को मायूसी नहीं होगी नवाज़ेगा ख़ुदा
गर कोई शख़्स मशक़्क़त पे उतर आता है

कम लेना भी बुरा होता है हक़ गोई से
ग़ैर किया अपना अदावत पे उतर आता है

ज़ुल्म जब हद से सिवा होता ज़माने में कभी
फिर तो इन्सान बग़ावत पे उतर आता है

बात माने ना जहां साद तिरी कोई भी
उस जगह क्यों तू नसीहत पे उतर आता है

अरशद साद रुदौलवी

         

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