चिराग़ तीरगी से ऊलझा

हर जगह हर किसी से उलझा है
आदमी आदमी से उलझा है

हौसला तो चिराग़ का देखो
किस क़दर तीरगी से उलझा है

ख़ुद ही दरिया वो रह गया प्यासा
जो मिरी तिश्नगी से उलझा है

इब्न-ए-आदम तो असर-ए-हाज़िर का
अपनी ही बेखुदी से उलझा है

तल्ख़ लहजा तुम्हारी बातों का
मेरी शाइस्तगी से उलझा है

एक क़तरा हक़ीर शबनम का
फूल कांटा कली से उलझा है

मेरे ग़म से अगर नहीं मतलब
क्यों तो मेरी ख़ुशी से उलझा है

ऐब ख़ुद के नज़र नहीं आते
और तो हर किसी से उलझा है

इस लिए ज़ख़म फूट पड़ते हैं
साद ग़म शायरी से उलझा है

अरशद साद रुदौलवी

         

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