छप्पर का डर

किसी के हाथ के पत्थर का डर नहीं होता
जो इस तरह मिरा शीशे का घर नहीं होता

ग़मों का बोझ अगर क़लब पर नहीं होता
मैं बेक़रार कभी इस क़दर नहीं होता

फ़िज़ा में उड़ती ना चिनगारियां जो नफ़रत की
तो मुझको सहन के छप्पर का डर नहीं होता

फ़िज़ा उड़ता परिंदा फ़लक को छू लेता
क़फ़स में क़ैद वो हाय अगर नहीं होता

कहीं सिसकती हैं कलियाँ तो है कहीं मातम
ये और बात है दिल-ए-पर असर नहीं होता

जुनून-ए-शौक़ में मंज़िल को पा लिया वर्ना
शदीद धूप में मुझसे सफ़र नहीं होता

अगर बिछाते ना हर गाम ख़ार हम और तुम
कोई भी रास्ता फिर पुर-ख़तर नहीं होता

में कह ना पाता ज़माने से हाल-ए-दिल अपना
जो शेअर कहने का मुझमें हुनर नहीं होता

कभी ना मिलता मुझे इंबिसात का साहिल
जो मुझपे मेहरबाँ ग़म का भंवर नहीं होता

सुलगती साँसों में आ तो गई कमी लेकिन
मिरा ये सोज़-ए-जिगर मुख़्तसर नहीं होता

उठानी पड़ती अज़ीयत ना साद इस दिल को
तिरी गली से जो मेरा गुज़र नहीं होता

अरशद साद रुदौलवी

         

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