जब मैं मिलूँ खुदा से तो मुझको होश में रखना

जब मैं मिलूँ खुदा से तो मुझको होश में रखना
हर ज़ुल्म की गिरह खोल सकूँ भरोस में रखना

ये सिसक, ये बेबसी, ये अपनों का ही आतंक
हर एक सवाल पूछ सकूँ इतना रोष में रखना

हिसाब बहुत कमजोर है तेरे दरबार का मौला
दर्द बेइन्तहाँ, खुशियों को क्यों ओस में रखना

तुम्हारी दुनियादारी बहुत देख ली है अब मैंने
रक़ीब पास में,अपनों को क्यों कोस में रखना

गर नहीं मुक़म्मल तुझसे मेरे रूह की मरम्मत
फिर सिर्फ इंसानों को यूँ ही क्यों दोष में रखना

सलिल सरोज

         

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