जवानी का ज़ोर

कब तक करेगा ज़ुल्म जवानी के ज़ोर पर
झूटी दलील झूटी कहानी के ज़ोर पर

मुट्ठी में क़ैद कर नहीं सकता कोई उसे
चलता किसी का ज़ोर ना पानी के ज़ोर

तन्हा हुई तो चंद ही लम्हों में ढह गई
दीवार-जो नई थी पुरानी के ज़ोर पर

साबित मुझे वो कर गया किज़्ज़ाब बज़्म में
अफ़सोस अपनी चर्ब ज़बानी की ज़ोर पर

बर्बाद करता रहता है गुलशन को आसमां
क्यों रोज़ अपनी बर्क़ फ़िशानी के ज़ोर पर

बेवक़त आज घर से निकलना पड़ा मुझे
बस रुत हसीन शाम सुहानी के ज़ोर पर

जाना मुझे कहीं था कहीं ले के आगया
दरिया भी अपनी साद रवानी के ज़ोर पर

अरशद साद रूदौलवी

         

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