“ज़रूरी तो नहीं”…

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जज़्बातों से हरदम हारना ज़रूरी तो नहीं ?
आँखों से अश्क़ें निकालना ज़रूरी तो नहीं ?
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पलकों के बंध तोड़ आना इक कमजोरी है ,
अश्क़ों के साथ पल गुजारना ज़रूरी तो नहीं ?
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गौर करो , अश्क़ें होते हैं मुसाफ़िर की तरह ,
जानबूझकर हाथ थामना ज़रूरी तो नहीं ?
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जब बहुत दर्द हो तो रोकर जी को हल्का कर लो ,
हर ग़म चेहरे पे डालना ज़रूरी तो नहीं ?
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हँसने का कारण तलाश लो , होगा ग़म गायब ,
सारे ग़म दिल पे उतारना ज़रूरी तो नहीं ?
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मजा तो तब आये जब आँखों से न गिरे अश्क़ ,
अच्छा समझकर इसे पालना ज़रूरी तो नहीं ?
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इक मुस्कुराहट लाख टके की दवा है “कृष्णा”,
रोकर यूँ ख़ुद को बिगाड़ना ज़रूरी तो नहीं ?
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— °•K. S. PATEL•°
( 07/04/2019 )

         

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