“ज़िंदगी के ख़िलाफ़ नारे”…

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क्यों समझ नहीं पाता इंसान , आज क़ुदरत के इशारे ?
और बेवज़ह फिरता रहता है हर दिशा हारे-हारे ?
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जो बोया है अब तक , वही तो कल काटने को मिलेगा ,
चाहे आँधी हो तेज तूफ़ान हो या फिर तेज धारे ।
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कंजूसी की भी कोई हद होती है इस ज़माने में ,
कैसे जी रहें हैं ये लोग यहाँ अपने जी को मारे ?
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इतना अधिक भी स्वार्थी होना भला कोई काम का है ?
बद्तर हाल बाँटकर ख़ुद ढूँढते ख़ूबसूरत नज़ारे ।
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अपनी हरक़तों से बदनाम होने का ख़ौफ़ नहीं आज ,
निशाना लगा रहें हैं दूसरों के कंधों के सहारे ।
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अच्छा कर्म तो कर लो अभी , अच्छा फल ज़रूर मिलेगा ,
अच्छी बात नहीं है लगाना , ज़िंदगी के ख़िलाफ़ नारे ।
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तूफ़ान से दो-दो हाथ करने का नाम ही ज़िंदगी है ,
ख़्वाब कैसे पूरा होगा , बैठे रहेंगे जो किनारे ?
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इंसान हो तो इंसानियत को भी दिखलाओ तो ज़रा ,
अहसास लगता है दफ़न कर दिये , ये सारे के सारे ?
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सीख ले कोई इनसे , इल्ज़ाम को भी लगाना “कृष्णा”,
करते कुछ भी नहीं और कहते हैं , ग़र्दिश में हैं सितारे ।
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— °•K.S. PATEL•°
( 20/04/2018 )

         

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