, जुगनू की औकात नहीं है।

                  ग़ज़ल

दर्द दिलों में लेकर हँसना, सबके बस की बात नहीं है ।

सूरज की भरपाई कर दे, जुगनू की औक़ात नहीं है।

भेड़ बकरियों के जैसे तुम, भाग रहे हो इधर-उधर क्यूँ,

इंसां हो तो रखो हौसला, तेजाबी बरसात नहीं है।

अगर नहीं है दिन इक ऐसा, होती जिसकी  रात नहीं हो,

जिसके बाद  न सूरज निकले, ऐसी भी तो रात नहीं है। 

दिल अपना है प्रीत पराई, तिनका-तिनका पाई-पाई,

वो दिल भी क्या दिल है जिसमें, यादों की बारात नहीं है।

लाखों लोगों की बलि दे कर, पाई है हमने आजादी, 

इसे बचाकर रखना ‘साहिब’, मुफ्त मिली सौगात नहीं है।

         ——मिलन साहिब।

         

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