“झुक जायेगी ये नज़र”…

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जो आज है वही असल ज़िंदगी है , कल की क्या ख़बर…?
एक साँस में ज़िंदगी है तो दूसरी साँस में क़बर…!
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मगर फिर भी छटपटाता रहता है आज इंसान…
हुई नहीं कुछ ख़्वाहिश , कहाँ कर पाता कोई सबर…?
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अज़ीब तरीक़े पाल रखे , हाल-चाल पूछने के…
हाल पूछ अनजाने छोड़ जाते शब्दों का ज़हर…!
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जान से जो मार डालते अब तो ही उचित होता…
सोचो , तिल-तिल मार के क्यूँ रिश्तों पे ढाते क़हर…?
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कुछ अच्छा कर जाओ तो सिर सदा ऊँचा रहेगा…
वरना दुनिया के सामने झुक जायेगी ये नज़र…!
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सोच-समझकर चलना हो तो चले आओ इस ओर…
वरना इतना आसां नहीं है ज़िंदगी का ये सफ़र…?
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अब तुम्हीं बतला दो अबकी बार ज़रा “कृष्णा” को…
इन हालातों में अब कैसे हो पाये गुजर-बसर…?
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— °•K.S. PATEL•°
( 05/07/2018 )

         

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