तमन्ना भी है यक़ीन भी है वतन में उल्फ़त का नूर होगा

++ग़ज़ल++(12122 12122 12122 12122 )
तमन्ना भी है यक़ीन भी है वतन में उल्फ़त का नूर होगा
न दहशतें हों न नफ़रतें हों कभी तो ऐसा ज़रूर होगा
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सियासतें लाख दम लगा लें अवाम में फ़ूट डालने की
हमारी कोशिश के आगे इक दिन ये चूर लेकिन ग़ुरूर होगा
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मगर है मुमकिन कि चन्द लोगों की फितरतों में हो धोका शामिल
तनाब* है गर दिलों की पक्की तो ख्वाब हर उन का चूर होगा (*डोर)
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कि जिसने पी है कभी नज़र से वही तो ये राज़ जानता है
मय-ए-नज़र के कहाँ मुक़ाबिल खुमार-ए-मै-ए-तुहूर*होगा (* स्वर्ग में पी जाने वाली मदिरा )
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मदद ग़रीबों की गर करोगे रहो ख़ुदा की इबादतों में
अगर चलोगे रह-ए-इमां* पर नसीब में कोह-ए-तूर** होगा
(*सच की डगर
**एक पवित्र पहाड़ जहाँ हज़रत मूसा को ईश्वरीय प्रकाश दिखाई दिया था )
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बहार आये तभी मुआके मिलेंगे गाने के बुलबुलों को
ख़िज़ाँ में नग्मे सुनाये ऐसा कोई न झुण्ड-ए-तुयूर* होगा (*पंक्षियों का झुण्ड )
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कभी न सोचा कि ज़िंदगी ये तवील* इतनी भी हो रहेगी (*लम्बी)
क़ज़ा तलक भी नशा-ए-उल्फ़त का मुझ पे ऐसा सुरूर होगा
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ख़याल में भी न सोचते थे दिखाएगा वक़्त ऐसे दिन भी
रहा कभी था जो पास इतना हयात से वो यूँ दूर होगा
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“न याद आएं न याद कीजै” किया था वादा जो वक़्त-ए-रुख़्सत
मगर ‘तुरंत ‘ अब अमल न उस पर किसी भी सूरत हुज़ूर होगा
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी
07 /07 /2018

         

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