तसव्वुर में

मेरा महबूब मेरी अनकही बातें बताता है।
भुला बेचैनियाँ दिन – रात ख़्वाबों को जगाता है।।

तसव्वुर में कभी राधा कभी मीरा बनाता है।
मुहब्बत में फ़लक से चाँद – तारे तोड़ लाता हैै।।

मिटाकर ज़िन्दगी चाहे रहे आबाद जीवन ये।
दिलों में नफरतों की आग इंसाँ ही लगाता है।।

फले-फूले खिले दुनिया यही चाहत लिए फिर क्यों?
ज़मी के नीम बरगद आम गमले में सजाता है।।

कहाँ आसान है होना ख़ुदा, ज़न्नत बसा लेना।
‘अधर’ मग़रूरियत में आदमी सच भूल जाता है।।

शुभा शुक्ला मिश्रा ‘अधर’

         

Share: