तुमको लगता है यहां तुम हो वफ़ादार फ़क़त

तुमको लगता है यहां तुम हो वफ़ादार फ़क़त
और अगर है तो कोई हम हैं गुनहगार फ़क़त

बुग़ज़-ओ-नफ़रत की अदावत की तशद्दुद की सदा
हम निहत्तों पे चलाई गई तलवार फ़क़त

जंग आज़ादी में भी नाम नहीं था इनका
आज बन बैठे हैं ये मलिक के सालार फ़क़त

माल-ओ-ज़र की ना हुकूमत की कोई चाहत है
हम मुहब्बत के हैं दुनिया से तलबगार फ़क़त

अब ना गांधी हैं ना नहरू हैं ना अशफ़ाक़ कोई
ये सियासत नहीं कुर्सी का है व्यापार फ़क़त

हम मुहब्बत में जवानी हैं लुटाए बैठे
तुम मुहब्बत में बने राह की दीवार फ़क़त

थे जो क़ातिल वही बन बैठे हुकूमत वाले
हम शहीदों की कहानी के हैं किरदार फ़क़त

ज़ात मज़हब नहीं इनका ना भरोसा कोई
”साद” ये लोग सियासी हैं अदाकार फ़क़त

अरशद साद रूदौलवी

         

Share: