तू अपनी उड़ान देख

सूरज न चाँद देख न सारा जहान देख|
कितना चटक गया है तू अपना मकान देख|
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मजहब न एक देख न गीता कुरान देख|
किस किसको दे चुका है तू अपनी जुबान देख|
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जुमलों से वार कर न यूँ सीना फुलाके चल,
ताने कोई खड़ा तेरी जानिब कमान देख|
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अच्छे दिनों का ख्वाब दिखाया जिन्हें यहाँ,
करते हैं खुदकुशी वो तो हर दिन किसान देख|

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झन्डे तले किसी को न मिलतीं हकीकतें, 

सच को  जो देखना है तो ऊँचा मचान देख|

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ताकत अभी बदन में कमाकर ये खा सकें, 

महनत जो कर रहे हैं तू उनकी थकान देख|

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अँगुली यूँ आसमां पे उठाने से क्या ‘मनुज’
फिर से न हो खराब तू अपनी उड़ान देख|

         

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