“तू सीखता चल”…

°°°
कोई भी परिपक्व नहीं इस ज़हां में , तू सीखता चल ।
इंसान है गल्तियों का पुतला , तू देखता चल ।
••
इक ऊँगली दूसरे पे तो चार अपनी तरफ होंगी ,
अपनी बुराइयों को भी गौर करके , तू झाँकता चल ।
••
हमेशा याद रखना “मैं” ले जाता है गर्त की ओर ,
“सर्व-हित” का सुंदर व्यवहार सोच में उतारता चल ।
••
मिलेंगे काम बिगाड़ने में माहिर बहुत से जन यहाँ ,
किसी की बात बने , ऐसे विचार को तू रोपता चल ।
••
जो बोये हो वही तो मिलेगी ज़िंदगी की बगिया में ,
दुश्मनी को उखाड़ फेंको और प्यार को सींचता चल ।
••
शरीर का क्या है , वो तो केवल मिट्टी का चोला है ,
नाम प्रसिद्ध हो , काम कुछ इस तरह से यहाँ करता चल ।
••
आज नहीं तो कल तुझे मंज़िल ज़रूर मिलेगी “कृष्णा”,
थमना मत , किसी की परवाह किए बिना बस चलता चल ।
°°°
— °•K.S.PATEL•°
( 21/01/2019 )

         

Share: