दरवेश की झोली

अपनी फ़ित्रत में दग़ा जिसने बसा रखी है
तुमने उम्मीद-ए-वफ़ा उस से लगा रखी है

चूड़ियां तोड़ दी सिंदूर मिटाया जिनका
उनकी मासूम हथेली पे हिना रखी है

ख़ौफ़ इन बुझते चराग़ों से उसे हो कैसे
जिसने सूरज से कभी आँख मिला रखी है

भीक तालाब से वो मांगे ये मुम्किन ही नहीं
जिसने ख़ुद प्यास समुंद्र की बुझा रखी है

तुझसे पहले भी सितम-गर थे बहुत दुनिया में
जिनकी इस दौर ने तारीख़ बना रखी है

मेरे मालिक ये तिरा फ़ज़ल-ओ-करम कम तो नहीं
तू ने दुनिया में मिरी लाज बचा रखी है

उसको बारूद ही कुछ लोग समझते हैं यहां
जबकि दरवेश की झोली में दुआ रखी है

हौसला बुझते चराग़ों में अभी है बाक़ी
इस लिए शर्त हवाओं से लगा रखी है

कैसे देनी है तुझे मात है मालूम मुझे
मैंने वो चाल अभी साद बचा रखी है

अरशद साद रूदौलवी

         

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