दिल की दौलतें

दिलों में बस गईं गर नफ़रतें हैं
फ़क़त बस नाम को ही मिल्लतें हैं
( मिल्लत = मेलजोल/मिलाप )

जिहालत से जहाँ में दिक्कतें हैं
बिना सर-पैर की बस किल्लतें हैं

ज़रा सा जेब में पैसा जो आया
कड़क आवाज़ है, ओछी लतें हैं

अना में डूबकर रहता वो ऐसे
ग़लत लहज़ा, बुरी सी आदतें हैं

न जाने दौड़ता क्यों शह् र सारा
मची किस बात की ये उजलतें हैं
(उजलत = उतावली/जल्दबाज़ी)

मोहब्बत क्या ,वफ़ा क्या ,दोस्ती क्या
हक़ीक़त में ये दिल की दौलतें हैं

बदल ‘आनन्द’ क्या देगा जहाँ को
बिना मतलब कहाँ अब चाहतें हैं

#स्वरचित
आनन्द किशोर
दिल्ली

         

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