दिल

कहीं हो चाँद पूनम का,किसी का दिल मचल जाए,
खिलौनों से तो मुश्किल है कि अपना जी बहल जाए।

कहाँ मालूम होता है किसी का भी यूँ हाल ए दिल,
न जाने कब कहाँ किस मोड़ पर किस किस को छल जाए।

हक़ीक़त है कि सारी उम्र दिल बच्चा ही रहता है,
कभी गैरों पे आ जाये,कभी अपनों से जल जाए।

नहीं चलता किसी का भी, कोई भी जोर है इस पर,
न जाने दिल ये कब किस पर, किसी भी पल मचल जाए।

बिना घाटा नहीं चलता, कोई सिक्का मुहब्बत का,
हजारों कोशिशों में से, कोई चल जाए चल जाए।

हक़ीक़त में तो है इक उम्र नाक़ाफ़ी मुहब्बत में,
किसे मालूम है किसका, कहाँ पर दम निकल जाए।

नशे से जब भी जो संभले, संभलना ही जरूरी है,
अगरचे वक़्त के रहते,संभल जाए संभल जाए।

बदलने में किसी दिल को है पल भर भी नहीं लगता,
मगर सदियों में भी कोई, बदल जाए बदल जाए।

दिमागों की ये अय्याशी नहीं है शायरी ‘साहिब’,
वफ़ा की छांव में दिल से इबादत हो तो पल जाए।
—मिलन ‘साहिब

         

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