दो दिन बचे हुए हैं अभी भी बहार के।

                 गजल 

मत रोइए हुज़ूर शब-ए-ग़म गुज़ार के,

दो दिन बचे हुए हैं अभी भी बहार के।

दरिया जो एक रूठा समंदर है सामने ,

मत हौसला गँवाना मुहब्बत में हार के।

तू इस क़दर बढ़ा दे मुहब्बत की ये कशिश,

रख दे वो चाँदनी तेरी छत पर उतार के।

छोड़ो उसे वो राह के पत्थर की तरह है,

थक जाओ तुम अगरके किसी को पुकार के।

उलझन न कोई सुलझे किसी तौर गर मियां,

सज़दे में उसको डालिए परवर दिगार के।

सच है कि दिलफ़िगार को मिलता नहीं कहीं,

पहलू में चैन मिलता है जो अपने  यार के।

‘साहिब’ कसे गए हैं जरूरत से जब अधिक,

टूटे तभी हैं तार किसी भी सितार के।

                 —–मिलन साहिब।

         

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