दौलतें विश्वास की जब जब दिलों से घट गईं

++ग़ज़ल++(२१२२ २१२२ २१२२ २१२ )
दौलतें विश्वास की जब जब दिलों से घट गईं
ज़र ज़मीँ के साथ रिश्तों में ख़राशें बट गईं
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कौन रखेगा मरासिम उनसे अब ता-ज़िंदगी
प्यार वाली डोरियाँ जब बीच में से कट गईं
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जुर्म देखेगीं सहेंगी भी मगर बोलें न कुछ
ऐसी क़ौमें मिट गईं तारीख़ से भी हट गईं
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वो शजर ज़िंदा रहे हर हाल में जिनकी जड़ें
कर इरादा आँधियों के हों मुक़ाबिल डट गईं
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हम जतन में ग़म भगाने के सदा उलझे रहे
और हों नाराज़ ख़ुशियाँ ग़ैर की चौखट गईं
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गाँव आये जब कभी भी हम अकेले शह्र से
आपकी यादें हमेशा ले हमें पनघट गईं
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सिर्फ़ मिल जाये उन्हें दो वक़्त की रोटी ‘तुरंत ‘
उम्रें उनकी आरज़ूएं रख वतन में कट गईं
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत ‘ बीकानेरी |

         

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