“नाश है नशा”…

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हँसी-खुशी ज़िंदगी पे , ये नशा भारी अत्याचार है ।
नशे से सिर्फ़ तन ही नहीं , मन भी होता बीमार है ।
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नशे की लत से नयी-नयी आफ़त है सामने आती ,
इसकी वज़ह हो जाता तहस-नहस हर घर-संसार है ।
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होशो-हवास में रह पाना बिल्कुल मुमकिन नहीं यहाँ ,
नशे ने बेवज़ह बिगाड़ रखा जीने का रफ़्तार है ।
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घर-परिवार में हो जाता अक्सर , बात-बात में कलह ,
हर पल अपमान के साथ अनुचित मिलता व्यवहार है ।
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दोस्त दूर हो जाते हैं , सम्मान भी मुँह मोड़ लेता ,
नशे की तलब में हर इंसान हो जाता बेकार है ।
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है सबसे गुज़ारिश , हर नशे के चंगुल से दूर रहें ,
इसकी संगत से सड़क पे आ जाता इज्जतदार है ।
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“कृष्णा” कहता है बुरी आदतों से दूर रहो यारों ,
बहकी-बहकी बातों की इस ज़माने में भरमार है ।
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— °•K.S.PATEL•°
( 23/12/2018 )

         

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