परेशाँ आजकल हर इक चमन

++एक मुसल्सल ग़ज़ल ++(1222 *4 )
परेशाँ आजकल हर इक चमन ख़ुद बागबाँ* भी है (*माली )
ज़मीँ ख़ामोश है सदमें में रहता आसमाँ भी है
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कली पर ज़ुल्म से हैरत में उस के पासबाँ* भी है (*रक्षक )
जद-ए-डाकू-ए-अस्मत* अब वतन हिंदोस्ताँ भी है (*आबरू के लुटेरों की परिधि में )
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जवानी जोश में भूली शराफ़त के सबक़ सारे
हवस की भूख के अब साथ बदले की फ़िजाँ भी है
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कहीं तेज़ाब से छलनी हुए रुख़्सार औरत के
कहीं रंज़िश से आशिक़ बन रहे अब बद्जुबाँ भी है
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हुआ जो मुल्क में और हो रहा है आजकल अक्सर
वतन में ख़ौफ़ के साये में बेटी और माँ भी है
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सियासतदाँ भले ख़ामोश बैठा देख सुन कर सब
मगर इक खलबली उसके जिगर के दरमियाँ भी है
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किसी की चीख सुनकर सन्न रह जाती है ये दुनिया
किसी के अश्क दामन में रहे अक्सर निहाँ* भी है (*छुपे हुए )
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फ़लक़ से देख कर इंसान की नापाक हरक़त को
करे कुछ क्यों नहीं सक़ते में क्या मुश्किलकुशाँ* भी है(* ख़ुदा )
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‘तुरंत’ आती है कुछ ख़बरें बशर की बेहयाई की
जुबाँ पर आ नहीं सकती निहाँ सी दास्ताँ भी है
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गिरधारी सिंह गहलोत ‘तुरंत’ बीकानेरी
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09 /07 /2018

         

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